फ़ोन का उस पर सख़्त पहरा है। जब वह खाना बनाती है, तब भी।
अब तुम खाना खा सकती हो।
फ़ोन ने किया अरेस्ट— एक सच्ची कहानी

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फ़ोन ने किया अरेस्ट— एक सच्ची कहानी

आनंद आर.के., सुपर्णा शर्मा और नैटली ओबिको पियरसन ४ दिसंबर २०२५

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लखनऊ, उत्तर प्रदेश — आबादी ४० लाख। रुचिका टंडन यहीं पली-बढ़ी। इस हफ़्ते से पहले — उस फ़ोन कॉल से पहले — उसकी ज़िंदगी बिल्कुल घड़ी की सुई जैसी चल रही थी।
हर सुबह, लगभग २ घंटे तक… २५ मीटर, मुड़ो २५ मीटर, मुड़ो
फिर लैब कोट पहन लिया जाता है। ८ घंटे, १० घंटे, १२ घंटे तक—रुचिका, जो एक न्यूरोलॉजिस्ट है, मिर्गी के मरीज़ों, स्ट्रोक के मरीज़ों, और पार्किंसन के मरीज़ों का इलाज करती है।
फिर घर लौटना अपने बेटे और माँ के पास।
डॉ. रुचिका टंडन? जी? यह टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया है। आपके नंबर के ख़िलाफ़ हमें २२ शिकायतें मिली हैं।
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन से। मैं अफसर राहुल गुप्ता उसकी जाँच हो रही है। मनी लॉन्ड्रिंग के लिए।
नया फ़ोन ख़रीदना होगा। अभी।
अधिकारी कहता है कि अगर रुचिका उसकी हर बात मानेगी, तो पुलिस जाँच के दौरान वह घर पर रह सकती है।
अब आप डिजिटल अरेस्ट में हैं।
आपको इन शर्तों का पालन करना होगा।
नियम धुंधले पड़ जाते हैं।
रुचिका को चक्कर आ रहा है।
उसी शाम, फ़ोन पर एक नया अधिकारी अपना परिचय देता है — विजय खन्ना, मुंबई पुलिस। उसे एक मनोवैज्ञानिक प्रश्नावली भरनी है। पाँच सौ सवाल।
दिन २। रुचिका को झूठ बोलना पसंद नहीं है। ना ही कोई राज़ रखना।
उसका ग्यारह साल का बेटा उसका नया फ़ोन देखना चाहता है, पर वह उसे यह नहीं बता सकती कि वह किस झमेले में फँसी है।
खन्ना बताता है कि उसे ऑनलाइन कोर्ट में पेश होना होगा। जज के सम्मान में सफ़ेद कपड़े पहनने होंगे।
वह अपने लिविंग रूम में अपने फ़ोन के सामने खड़ी है।
उसे कोर्ट दिखाई नहीं देता… लेकिन कानों में अदालत की आवाज़ें गूँजती हैं।
और फिर वह एक जज की आवाज़ सुनती है—फ़ोन कहता है, देश के सबसे वरिष्ठ जज—पूछ रहे हैं कि क्या कोई संबंध उस भारतीय बिज़नेसमैन से है जिस पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है।
जज फ़ैसला सुनाते हैं। रुचिका को अपना सारा पैसा एक “सीक्रेट सुपरविज़न” अकाउंट में जमा करना होगा।
कोई आया है। रुचिका के अंकल उसकी माँ दरवाज़ा खोलती है।
रुचिका घबराकर छिपने की जगह तलाशती है।
रुचिका को बचपन से नियम मानना सिखाया गया था। स्कूल में वह हमेशा क्लास टॉपर रही। ज़िंदगी में वह कभी थाने नहीं गई।
रुचिका के पाँच बैंकों में खाते हैं। इन्हीं खातों में उसके परिवार की तीन पीढ़ियों की पूँजी जमा है — लगभग ढाई करोड़ रुपये।
मैडम, पक्का? इतनी बड़ी रकम क्यों? रुचिका पहली रकम ट्रांसफर करती हैं।
वह दूसरे बैंक जाती है… मैडम, श्योर? पैंतालीस लाख?
कई सालों से रुचिका गिटार सीख रही है। उसका बेटा डांस सीखता है। आज उनके गानों का शो है। उसका बेटा जाता है। रुचिका घर पर ही रहती है फ़ोन की क़ैद में।
आप जो वहाँ गाने वाली थीं, वह मुझे सुना दीजिए? खन्ना भी उसके साथ गुनगुनाने लगता है।
दिन ५, ६, ७, ८। एक और ऑनलाइन सुनवाई। रुचिका कहती है — सारा पैसा एक साथ नहीं निकाल सकती। इतने सारे खाते। इतने सारे बैंक। जज उसे एक दिन की और मोहलत देता है।
वह और पैसे ट्रांसफ़र करती है। निर्दोष पाए जाने पर पैसा वापस मिल जाएगा।
हम आपको आख़िरी मोहलत दे रहे हैं। आज शाम ४ बजे तक।
दिन ख़त्म होने से पहले, वह और २१,००,००० रुपये ट्रांसफ़र कर देती है।
थोड़े बहुत पैसे अभी भी हैं, पर वह उन्हें तुरंत नहीं निकाल सकती। अगर पैसे नहीं मिल रहे… तो किसी से उधार ले लो। मैंने ज़िंदगी में कभी उधार नहीं लिया। और लेने के लिए… कोई है भी नहीं।
जब देने के लिए कुछ भी पैसे नहीं बचे, फ़ोन से सारी आवाज़ें ग़ायब हो जाती हैं।
रुचिका सोचती है — अब? आगे क्या? वह काम पर जाने के लिए तैयार होती है।
वह सड़क पर निकल आती है।
रुचिका सोचती रहती है कि उसके साथ क्या हुआ। और जैसे ही वह थोड़ा सुरक्षित महसूस करती है, अपने सवालों के जवाब ढूँढने लगती है। वह गूगल करती है।
वह अपना सिर अपने हाथों में पकड़े हुए है।
वह साइबर अपराध पुलिस स्टेशन की ओर चलती है।
२७ अक्तूबर, २०२४। रुचिका के डिजिटल अरेस्ट के दो महीने बाद,
साल २०१५ में मोदी ने ही भारत में डिजिटल क्रांति को बढ़ावा दिया।
इस साल, इन स्कैमों की जाँच करते हुए ब्लूमबर्ग के पत्रकारों ने ऑनलाइन एक ‘फ्रॉड किट’ खोज निकाली—जिसमें लिखित स्क्रिप्टें, तरीके और पूरे निर्देश थे कि कैसे किसी को भी “डिजिटल अरेस्ट” में डाला जा सकता है। यह किट सिर्फ़ $9.99 में खरीदी जा सकती है।

आनंद आर.के., मुंबई के एक कलाकार, ब्लू इन ग्रीन (Blue in Green) और ग्रैफ़िटी’ज़ वॉल (Grafity’s Wall) जैसी ग्राफ़िक नॉवेलों के चित्रकार हैं। वह पेंटिंग भी करते हैं और डीसी कॉमिक्स के लिए आर्टवर्क बना चुके हैं।

सुपर्णा शर्मा, दिल्ली स्थित अनुभवी खोजी संवाददाता हैं जिन्होंने अपराध और अदालतों से जुड़े मामलों पर व्यापक रिपोर्टिंग की है।

नैटली ओबिको पियरसन, टोक्यो में आधारित, ब्लूमबर्ग एशिया की वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं। वह सात वर्षों तक भारत में रहीं और रिपोर्टिंग की।

अनुवाद: ज़ीशान हसन अख़्तर। लेटरिंग: आदित्य बिड़िकर। रंग: निशा सिंह।

निर्माण: नादजा पोपोविच, केन आर्मस्ट्रॉन्ग, अमांडा कॉक्स, फ़्लिन मैक्रॉबर्ट्स और जूई चक्रवर्ती।